भारतीय रेल का शयन-यान…

भारतीय रेल का शयन-यान;

बड़ा विचित्र है श्रीमान।

जनरल बोगी से ये कुछ कम नहीं;
इससे अनभिज्ञ अनजान अब हम नहीं।
अभी उसी में सफर कर रहे हैं;
सफर क्या है, अजी बस मर रहे हैं।
इधर-उधर यहाँ-वहां, सफाई कुछ ख़ास है;
गंध इतनी ख़ास है की नहीं आ रही हमें रास है।
इतनी सफाई है कि कुछ सामान भी है;
वहीँ सुट्टा सुलगा है जहाँ धूम्रपान नहीं माफ़ है।
चिकन बिरयानी, अंडा बिरयानी, वैज बिरयानी;
कोई खरीदे या नहीं, फिर भी हर पांच मिनट में है इन्हें फेरी लगानी।
यहाँ पंखे कम, लोग ज़्यादा घूमते हैं;
और दोस्त साथ हों, तो सब साथ झूमते हैं।
मेरे बगल की आपात्कालीन खिड़की अब भी खुली है;
शायद इतना इस्तेमाल हुई है कि सामान्य में जा रुली है।
गाडी खड़ी करने के लिए ज़ंजीर खींचिए ;
पर प्रभु चलाने का भी तो कोई उपाय दीजिये।
बोलिए चाय कॉफ़ी टमाटर सूप;
पीकर देखो अजब गजब अपना रंग रूप।
कोई पानी ले लो, कूल ड्रिंक तो लो;
और कुछ नहीं तो मुझसे खाने में अंडा तो लो।
बस यही सब आवाज़ें यहाँ गूँज रही हैं;
लोग सो रहे हैं, जाने फेरी वालों को क्या सूझ रही है।
पर हाँ, यहीं मैंने हौंसले की पराकाष्ठा देखी;
एक पैर से विकलांग की मेहनत में आस्था देखी।
चलती ट्रेन में वैसाखी के सहारे वो फेरी लगा रहा है;
ईश्वर की देन को स्वीकार कर मेहनत की रोटी खा रहा है।
चलिए अब ट्रेन ने रफ़्तार पकड़ ली है;
और निद्रा ने लोगों की स्तिथि जकड ली है।
अब हम भी शयन यात्रा पर चलेंगे;
और खुद-हाफ़िज़ शब्बा-ख़ैर जल्द ही फिर मिलेंगे॥

दोहे (1/4)

पढ लिख, बन ठन बन गया, यूं तो साहब तू।
काला धन संचित करे, करे ह‍‌‌‍ै काला मूँह॥
रात निशाचर जागते, सत्य यदि यह ज्ञान।
रोती मानवता कहे, कहाँ बचा इन्सान॥
चलता-चलता रुक गया, ये दिल थक कर चूर।
उसको कहती आत्मा मैं चलती अब दूर॥
बीन बीन पत्थर प्रहर, प्रहरी किया खड़ा।
प्रकृति के सामने कब तक रहा बड़ा॥

पथ में पत्थर देख के, मोसे कहें ये पाओं।
मंज़िल तुझको चाहिए, मैं क्यों कष्ट उठाऊं॥