दोहे – 1

पढ लिख, बन ठन बन गया, यूं तो साहब तू।
काला धन संचित करे, करे ह‍‌‌‍ै काला मूँह॥
रात निशाचर जागते, सत्य यदि यह ज्ञान।
रोती मानवता कहे, कहाँ बचा इन्सान॥
चलता-चलता रुक गया, ये दिल थक कर चूर।
उसको कहती आत्मा मैं चलती अब दूर॥
बीन बीन पत्थर प्रहर, प्रहरी किया खड़ा।
प्रकृति के सामने कब तक रहा बड़ा॥

पथ में पत्थर देख के, मोसे कहें ये पाओं।
मंज़िल तुझको चाहिए, मैं क्यों कष्ट उठाऊं॥

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